साल 1933 2 जून को सऊदी अरब के जेद्दा स्थित ब्रिटिश दूतावास से भारत के वायसराय को एक आधिकारिक चिट्ठी भेजी गई। इस चिट्ठी में बिहार के एक बैरिस्टर, मुहम्मद यूनुस का ज़िक्र था, जिन्होंने हज यात्रा के दौरान सऊदी सरकार को कई आर्थिक सुझाव दिए थे।
यूनुस ने सुझाव दिया कि घोड़ों के प्रजनन को बढ़ाया जाए, विदेशी मुसलमानों को हिजाज़ में बसने की अनुमति दी जाए, मक्का से मदीना तक हिजाज़ रेलवे को फिर से चालू किया जाए, और हज यात्रियों के लिए होटल और सुविधाओं में सुधार किया जाए। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में हज का बड़े पैमाने पर प्रचार किया जाए, मुस्लिम रियासतों को हज के लिए आमंत्रित किया जाए, और हरम में भिखारियों के प्रवेश पर रोक लगाई जाए।
हालांकि, सऊदी वित्त मंत्री ने इन सुझावों को गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि उनमें स्थानीय परिस्थितियों की समझ की कमी मानी गई।
इसके बाद भारत सरकार ने यह जानने की कोशिश की कि मुहम्मद यूनुस आखिर हैं कौन।
5 जुलाई 1933 को वायसराय कार्यालय से बिहार सरकार को पत्र भेजा गया, और 20 जुलाई 1933 को बिहार के मुख्य सचिव डब्ल्यू. बी. ब्रेट ने इसका जवाब दिया।
इस जवाब में बताया गया कि मुहम्मद यूनुस पटना हाई कोर्ट के बैरिस्टर थे, जिनके पास काफी संपत्ति थी और उनकी पूंजी मुख्य रूप से पटना के रियल एस्टेट में निवेशित थी। वे बिहार विधान परिषद के सदस्य भी रह चुके थे और राजनीति में सक्रिय थे, लेकिन मुस्लिम समाज में उनका प्रभाव सीमित था। उनका एक छोटा अखबार भी था, लेकिन उसके संचालन में उनकी सीधी भूमिका नहीं थी। उन्हें बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट्स संभालने का पर्याप्त अनुभव नहीं माना गया।
हम बैरिस्टर मुहम्मद युनूस जैसे लोगों को याद रखते तो आज हालात अलग होते
असल में, मुहम्मद यूनुस एक बेहद महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे। उनके कई सुझाव उनके अपने व्यावसायिक हितों से भी जुड़े हुए थे।
वे जानवरों के व्यापार में सक्रिय थे, रियल एस्टेट का काम करते थे, बख्तियारपुर लाइट रेलवे में साझेदार थे, पटना के ग्रैंड होटल के मालिक थे, और प्रिंटिंग प्रेस व अखबार से भी जुड़े थे। इसके अलावा वे बैंकिंग कारोबार में भी शामिल थे। आगे चलकर, यही बैरिस्टर मुहम्मद यूनुस बिहार के पहले प्रधानमंत्री, यानी मुख्यमंत्री बने।
बैरिस्टर मुहम्मद यूनुस द्वारा सऊदी हुकूमत को जो सुझाव दिए थे, वो कुछ इस तरह थे :-
1- ख़रीद फ़ोरोख़्त के लिए घोड़ों का प्रजनन को बढ़ाने पर ज़ोर और इसके लिए वो नजद् में एक पशु-चिकित्सक भेजने को तैयार थे।
2- ग़ैर अरबी मुसलमानों को हिजाज़ में बसने की अनुमति दी जाए और उन्हें भूमि प्रदान की जाए, जैसा कि फ़िलिस्तीन में यहूदियों को दिया जाता है।
3- मक्का से मदीना तक हिजाज़ रेलवे लाइन को पुनः चालू किया जाए, जिसके लिए उन्होंने अपनी सेवाएं देने की पेशकश की।
4- वर्तमान होटलों की स्थिति में सुधार किया जाए और मदीना मार्ग पर अधिक विश्राम गृह बनाए जाएं।
5- भारत में हज के संबंध में बड़े पैमाने पर प्रचार अभियान चलाया जाए, जैसे कि पुस्तिकाएं प्रकाशित करना आदि, और यह कार्य उन्हें सौंपा जाए।
6- हिजाज़ी और भारतीयों को मिलाकर एक प्रतिनिधिमंडल बनाया जाए जो भारत के मुस्लिम राजाओं से मिले और उन्हें हज करने के लिए आमंत्रित करे; साथ ही उनसे सड़कों के निर्माण हेतु धन जुटाने की अपील की जाए।
7- हरम के परिसर में भिखारियों के प्रवेश को रोका जाए।
यह कहानी सिर्फ एक चिट्ठी की नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की है, जो हर मौके में संभावना देखता था। इसमें मज़ेदार बात यह है कि अगर आप ध्यान दें, तो 2026 तक सऊदी अरब ने इनमें से अधिकांश सुझाव अपने हिसाब से लागू कर लिए हैं।

इन सबमें सबसे मज़ेदार बात यह है जी जून 1937 में जब बैरिस्टर मुहम्मद यूनुस बिहार के प्रधानमंत्री थे, तब सऊदी अरब जो उस समय हेजाज़ कहलाता था, के राजा इब्न सऊद ने मुहम्मद यूनुस के सम्मान में ख़िलअत भेजा था। यह ख़िलअत इब्न सऊद के प्रधानमंत्री द्वारा उनकी ओर से भेजा गया था। इस ख़िलअत में एक सोने की टोपी, ऊँट के बालों का एबा (चोगा) और एक सुंदर शॉल शामिल है। इससे ये समझ में आता है कि बैरिस्टर मुहम्मद यूनुस लगातार सऊदी राज परिवार से ताल्लुक रखे हुए थे।



