जलियांवाला बाग़ नरसंहार से पहले की कहानी जिसके डर से अंग्रेज़ों ने रची थी ये साजिश

9 अप्रैल 1919 को आयोजित रामनवमी की शोभायात्रा का आयोजन एक मुस्लिम डॉ. बशीर द्वारा किया जाना अंग्रेज हुकूमत को बिल्कुल रास न आया।

इसी तरह की एकता का नजारा लाहौर में भी देखने को मिल रहा था। वहां हिंदू व सिख मुग़ल बादशाही मस्जिद में जाकर राजनीतिक सभाएं कर रहे थे।
इसी प्रकार देश के विभिन्न भागों में मंदिरों में जाकर मुस्लिम सभाओं को संबोधित कर रहे थे। देश में एकता की एक अनोखी बयार बह रही थी, जो अंग्रेजों के लिए चिंता का सबब बन गई थी।

हिंदू-मुस्लिम एकता में दरार पैदा करना अंग्रेज अपनी हुकूमत को मजबूत रखना चाहते थे लेकिन पंजाब में हिंदू- मुस्लिम- सिख एकता उन्हें दोबारा 1857 क्रांति की याद दिला रही थी।

इसी डर की वजह से अंग्रेजों ने सत्याग्रह में शामिल क्रांतिकारी नेता डॉ सत्यपाल और डॉ सैफ़ुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया।

जैसे ही इनकी गिरफ्तारी की खबर फैली, उसके विरोध में पंजाब कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए और रैलियां भी निकाली गईं। ब्रिटिश सरकार द्वारा विरोध प्रदर्शनो और रैलियो को रोकने के लिए अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया ताकि सभी सभाओं और रैलियों पर रोक लगाई जा सके।

जलियांवाला बाग, अमृतसर में प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर से महज 600 मीटर की दूरी पर स्थित हैं। उस समय इस बाग के चारों और बड़ी-बड़ी दीवारें बनी हुई थी और प्रवेश और निकासी का केवल एक ही रास्ता था।  13 अप्रैल 1919, बैसाखी के पर्व पर, काफी बड़ी संख्या में लोग, अमृतसर के जलियांवाला बाग में विरोध में एकत्र हुए, चूँकि दिन बैसाखी का था तो एकत्र हुई इस भीड़ मे महिलाएँ और बच्चे भी बड़ी संख्या मे थे।

जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में निहत्थे नागरिकों जिसमे महिलाएँ और बच्चे भी बड़ी संख्या मे थे, पर गोलियां चलाने के आदेश दे दिये। गोलियां चलानी शुरू हो गई बाहर जाने के रास्ते बंद कर दिए गए जिसमें हजारों निहत्थे बेगुनाहों शहीद हो गए…

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