पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण को ठुकराने वाले उस्ताद विलायत ख़ां…

उस्ताद विलायत ख़ां का जन्म 28 अगस्त 1928 में गौरीपुर (इस समय बांग्लादेश) में एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। पिता, प्रख्यात सितार वादक उस्ताद इनायत हुसैन ख़ाँ, की जल्दी मौत के बाद उन्होंने अपने नाना और मामा से सितार बजाना सीखा।

आठ वर्ष की उम्र में पहली बार उनके सितारवादन की रिकॉर्डिंग हुई। उन्होंने पाँच दशकों से भी अधिक समय तक अपने सितार का जादू बिखेरा। उस्ताद विलायत ख़ाँ की पिछली कई पुश्तें सितार से जुड़ी रहीं और उनके पिता इनायत हुसैन ख़ाँ से पहले उस्ताद इमदाद हुसैन ख़ाँ भी जाने-माने सितारवादक रहे थे। उस्ताद विलायत ख़ाँ के दोनों बेटे, सुजात हुसैन ख़ाँ और हिदायत ख़ाँ भी तथा उनके भाई इमरात हुसैन ख़ाँ और भतीजे रईस ख़ाँ भी जाने माने सितार वादक हैं।

वे संभवतः भारत के पहले संगीतकार थे जिन्होंने भारत की आज़ादी के बाद इंग्लैंड जाकर संगीत पेश किया था। विलायत ख़ाँ एक साल में आठ महीने विदेश में बिताया करते थे और न्यूजर्सी उनका दूसरा घर बन चुका था। विलायत ख़ाँ ने सितार वादन की अपनी अलग शैली, गायकी शैली, विकसित की थी जिसमें श्रोताओं पर गायन का अहसास होता था।

विलायत खां के सितार वादन में तंत्रकारी कौशल के साथ-साथ गायकी अंग की स्पष्ट झलक मिलती है। सितार को गायकी अंग से जोड़कर उन्होंने अपनी एक नई वादन शैली की नींव रखी थी। उनका यह प्रयोग वादन को गायकी अंग से जोड़ देता है। विलायत खां ने सितार के तारों में भी प्रयोग किए थे। सबसे पहले उन्होंने सितार के जोड़ी के तारों में से एक तार निकाल कर एक पंचम स्वर का तार जोड़ा। पहले उनके सितार में पांच तार हुआ करते थे। बाद में एक और तार जोड़ कर संख्या छ: हो गई थी। अपने वाद्य और वादन शैली के विकास के लिए वे निरन्तर प्रयोगशील रहे। एक अवसर पर उन्होंने स्वयं भी स्वीकार किया कि वर्षों के अनुभव के बावजूद अपने हर कार्यक्रम को एक चुनौती के रूप में लेते थे और मंच पर जाने से पहले दुआ मागते थे कि इस परीक्षा में भी वे सफलता पाएं।

उनकी कला के सम्मान में राष्ट्रपति फ़ख़रूद्दीन अली अहमद ने उन्हें आफ़ताब-ए-सितार का सम्मान दिया था और ये सम्मान पानेवाले वे एकमात्र सितारवादक थे। लेकिन उस्ताद विलायत ख़ां ने 1964 में पद्मश्री और 1968 में पद्मभूषण सम्मान ये कहते हुए ठुकरा दिए थे कि भारत सरकार ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान का समुचित सम्मान नहीं किया। साल 2000 में पद्म विभूषण के लिए आमंत्रित किया गया, पर उन्होने फिर से इसे ठुकरा दिया।

उस्ताद विलायत ख़ां ने कुछ प्रसिद्ध फिल्मों में भी संगीत दिया था। 1958 में निर्मित सत्यजीत रे की बांग्ला फिल्म जलसाघर, 1969 में मर्चेन्ट आइवरी की फिल्म दि गुर’ और 1976 में मधुसूदन कुमार द्वारा निर्मित हिन्दी फिल्म कादम्बरी उस्ताद विलायत खां के संगीत से सुसज्जित था। वे वास्तव में सरल, सहज और सच्चे कला साधक थे।

13 मार्च 2004 को उनका देहांत हो गया। उन्हें फेफ़ड़े का कैंसर था जिसके इलाज के लिए वे जसलोक अस्पताल में भर्ती थे। उनका अधिकतर जीवन कोलकाता में बीता और उनका अंतिम संस्कार भी उन्हें उनके पिता की क़ब्र के समीप दफ़ना कर किया गया।

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